मोस्ट वांटेड आतंकी जाकिर मूसा के पंजाब में छिपे होने की खबरें आ रही हैं. पंजाब के फिरोजपुर-भटिंडा में जाकिर मूसा सिख भेष में छुपा हो सकता है, जिसकी तस्वीरें भी जारी की गई हैं. इसको लेकर आईबी, सीआईडी और आर्मी इंटेलिजेंस ने इनपुट जारी किया है. बता दें कि जाकिर मूसा के पिछले काफी दिनों से पंजाब में छुपे होने की खबरें आ रही थीं. जिसको देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां सतर्क थीं.
इनपुट मिलने के बाद पुलिस फिरोजपुर से सटे ममदोट गांव में सर्च ऑपरेशन चल रहा है. बता दें कि ये गांव पाकिस्तान बॉर्डर से सटा हुआ है. गांव के आसपास सैकड़ों एकड़ में जंगल फैला हुआ है, यही कारण है कि यहां सर्च ऑपरेशन में मुश्किलें आ रही हैं.
गौरतलब है कि जाकिर मूसा अलकायदा का कमांडर है, बीत दिनों से ही उसके लगातार मूव होने की खबरें थीं. पहले पंजाब और फिर राजस्थान में जाकिर मूसा के होने की खबरें थीं. इससे पहले भी इनपुट था कि मूसा करीब 7 साथियों के साथ पंजाब में घुसा था.
अभी कुछ दिन पहले ही जाकिर मूसा अपने साथियों के साथ अमृतसर में देखा गया था. यही कारण है कि पुलिस पंजाब में कई ड्रम स्मगलरों के घरों में छापा मार रही है जिसके बारे में अंदेशा है कि उनके आतंकियों के साथ संबंध हो सकते हैं, साथ ही सीमापार से हथियारों और नशीली चीजों के अवैध स्मगलिंग में शामिल भी हों.
गौरतलब है कि जाकिर बुरहान वानी के इलाके त्राल क्षेत्र का रहने वाला है, जिसने 2016 में 8 जुलाई को वानी की मौत के बाद ग्रुप का नेतृत्व संभाला था. वह आतंकी संगठन में शामिल होने से पहले चंडीगढ़ कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. और कहा जाता है कि वह बहुत मौज-मस्ती करने वाला युवा था.
पुलिस के मुताबिक उस समय थाने में दो महिला कॉन्स्टेबल और एक कॉन्स्टेबल मौजूद था. इस दौरान राहुल के परिजनों ने हंगामा करके एक वायरलेस सेट भी तोड़ दिया. साथ ही वहां मौजूद कॉन्स्टेबल से मार-पिटाई कर राहुल को अपनी कार में भगा ले गए.
राहुल के भागते ही पुलिसकर्मियों ने वायरस पर मैसेज कर दिया, जिसके बाद तुरंत कार को बैरिकेड लगाकर रोका गया. लेकिन जब तक पुलिसकर्मी उनको पकड़ते तब तक राहुल व उसके दोस्त कार से भागने में सफल रहे.
इस पूरे मामले में गाजियाबाद के एसएसपी उपेंद्र कुमार अग्रवाल ने बताया कि दो पक्षों में ट्रॉनिका सिटी क्षेत्र में झगड़ा हुआ था, जिसके बाद दोनों ही पक्षों को थाने लाया गया था. लेकिन एक पक्ष के लोग अपने साथी को छुड़ाकर भाग गए थे. इस पूरे मामले में ट्रॉनिका सिटी पुलिस ने 12 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया है. फिलहाल पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है और 6 की तलाश जारी है.
Thursday, December 6, 2018
Thursday, November 29, 2018
अपने आंगन की गौरैया की ये बातें आप नहीं जानते
घरेलू गौरैया दुनिया में सबसे ज़्यादा इलाक़ों में पायी जाने वाली जंगली चिड़िया है. ये परिंदा अंटार्कटिका के सिवा हर महाद्वीप पर पाया जाता है.
गौरैया को अक्सर इंसानों की बस्ती के आस-पास देखा गया है. फिर चाहे वो शहरी इलाक़ा हो, जंगल हों या फिर ग्रामीण बस्तियां.
हालांकि, अब पूरी दुनिया में गौरैया की आबादी घट रही है. ब्रिटेन में तो गौरैया बड़ी तेज़ी से ख़त्म हो रही हैं.
लेकिन, बहुत से देशों में गौरैया की अपनी अलग पहचान है. किसी झाड़ी, पेड़ या दीवार की दरार से चांव-चांव करती गौरैया का दिख जाना बहुत आम बात है.
कभी ये तालाब में तो कभी किसी नदी या पोखर में गोते लगाती भी दिख जाती हैं.
कैसे हुआ गौरैये का विकास
इतनी ज़्यादा तादाद में होने के बावजूद, अचरज की बात ये है कि इसके विकास की कहानी के बारे में हाल के दिनों तक लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं थी.
माना जाता है कि इस पक्षी की नस्ल सबसे पहले मध्य-पूर्व में विकसित हुई थी. यहीं से ये पूरे यूरोप और एशिया में फैल गई.
बाद में इस पंछी को ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमरीका ले जाकर आबाद किया गया.
यूजीन शीफेलिन नाम के एक कलाकार ने अमरीका में शेक्सपियर के नाटकों के मंचन के दौरान गौरैया को भी नाटकों का किरदार बनाने की कोशिश की.
ये बात उन्नीसवीं सदी के आख़िर की है. शायद यूजीन ने ही अमरीका का तार्रुफ़ गौरैया से कराया था.
क्या गौरैया को ग़ैरज़रूरी समझा गया?
नॉर्वे की ओस्लो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मार्क रविनेट को घरेलू गौरैया के विकास की कहानी में दिलचस्पी तब पैदा हुई, जब उन्हें अंदाज़ा हुआ कि गौरैया के विकास की कहानी पर तो किसी ने ढंग से ग़ौर ही नहीं किया.
द रॉयल सोसाइटी की तरफ़ से प्रकाशित एक लेख में मार्क ने इस परिंदे के विकास पर अच्छी रोशनी डाली है.
गौरैया चूंकि बड़ी तादाद में हमारे आस-पास दिखती है, शायद इसीलिए हमने इसके विकास को समझने की कोशिश नहीं की.
लेकिन, मार्क रविनेट के रिसर्च से कई चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं.
ये बात तो पहले से साफ़ थी कि गौरैया ने ख़ुद को इंसानों के आस-पास रहने के हिसाब से ढाल लिया था.
चूंकि, गौरैया ने इंसानी बस्तियो के आसपास लंबा वक़्त गुज़ारा था, तो ये वक़्त की मांग थी कि ये पंछी, इंसानों से तालमेल बैठा लें.
गौरैया को अक्सर इंसानों की बस्ती के आस-पास देखा गया है. फिर चाहे वो शहरी इलाक़ा हो, जंगल हों या फिर ग्रामीण बस्तियां.
हालांकि, अब पूरी दुनिया में गौरैया की आबादी घट रही है. ब्रिटेन में तो गौरैया बड़ी तेज़ी से ख़त्म हो रही हैं.
लेकिन, बहुत से देशों में गौरैया की अपनी अलग पहचान है. किसी झाड़ी, पेड़ या दीवार की दरार से चांव-चांव करती गौरैया का दिख जाना बहुत आम बात है.
कभी ये तालाब में तो कभी किसी नदी या पोखर में गोते लगाती भी दिख जाती हैं.
कैसे हुआ गौरैये का विकास
इतनी ज़्यादा तादाद में होने के बावजूद, अचरज की बात ये है कि इसके विकास की कहानी के बारे में हाल के दिनों तक लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं थी.
माना जाता है कि इस पक्षी की नस्ल सबसे पहले मध्य-पूर्व में विकसित हुई थी. यहीं से ये पूरे यूरोप और एशिया में फैल गई.
बाद में इस पंछी को ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमरीका ले जाकर आबाद किया गया.
यूजीन शीफेलिन नाम के एक कलाकार ने अमरीका में शेक्सपियर के नाटकों के मंचन के दौरान गौरैया को भी नाटकों का किरदार बनाने की कोशिश की.
ये बात उन्नीसवीं सदी के आख़िर की है. शायद यूजीन ने ही अमरीका का तार्रुफ़ गौरैया से कराया था.
क्या गौरैया को ग़ैरज़रूरी समझा गया?
नॉर्वे की ओस्लो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मार्क रविनेट को घरेलू गौरैया के विकास की कहानी में दिलचस्पी तब पैदा हुई, जब उन्हें अंदाज़ा हुआ कि गौरैया के विकास की कहानी पर तो किसी ने ढंग से ग़ौर ही नहीं किया.
द रॉयल सोसाइटी की तरफ़ से प्रकाशित एक लेख में मार्क ने इस परिंदे के विकास पर अच्छी रोशनी डाली है.
गौरैया चूंकि बड़ी तादाद में हमारे आस-पास दिखती है, शायद इसीलिए हमने इसके विकास को समझने की कोशिश नहीं की.
लेकिन, मार्क रविनेट के रिसर्च से कई चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं.
ये बात तो पहले से साफ़ थी कि गौरैया ने ख़ुद को इंसानों के आस-पास रहने के हिसाब से ढाल लिया था.
चूंकि, गौरैया ने इंसानी बस्तियो के आसपास लंबा वक़्त गुज़ारा था, तो ये वक़्त की मांग थी कि ये पंछी, इंसानों से तालमेल बैठा लें.
Wednesday, November 7, 2018
观点:美国中期选举考验华人“川粉 ”
美国中期选举因为主要发生在地方层面,不涉及总统职位,公众参与热情较低,一般都会比较平淡沉闷。但2018年的中期选举尤其具有戏剧性,历史也会证明它的重大意义。美国的一系列重大价值(文明特性、文化认同、民主自由理念、经济政策、全球地缘军事战略等)都会再次受到考验和经历挑战。
美国总统特朗普(又称川普)上任后在下列议题提出重大变革:移民限制,降低税收,削减福利(包括立志取消奥巴马医保),取消少数族裔促进政策,对华贸易和地缘政治大调整,性别认同等等,每一项议题都挑动了在美华人的神经。不难理解,在华人圈,甚至在跨国华人网络空间(微信,推特等社交媒体为平台),特立独行、满嘴跑火车的川普总统像一个巨大的磁铁,吸附了一批华人粉丝,同时也分化了部分华人。因为这些重大议题对华人造成的分歧模式不是“叠加强化型”(“白人、男性、无大学教育、南部居民、福音派信徒”模式使得特朗普倾向强化),而是“横向交叉型”(“亚裔女性、新移民、高收入、东北海岸居民、台湾认同”会使得选择复杂化),所以华人社区的政治争吵就似雾中看花,有时还因为与中国国内政治粘连,更像是一场泥淖中的烂仗。
美国政治现实是:人气和财力是政治较量的最关键资源。380万只占总人口1.5%的华人影响力必然微不足道。下列因素还在继续削弱华人影响:内部分裂(大陆/台湾/香港/东南亚背景,老华侨/新华人,第一代/本土出生,反共/拥共等等)、集中都会区而居住又郊区化(当然有中国城居民和郊区居民的差异)、文化障碍(语言、宗教和社区社团等因素)。而且,三分之一以上的亚裔女性与外族结婚(2013年的数字37%),比亚裔男性同类数字高出21个百分点。这一婚姻模式使得未来亚裔族群的政治人气不会有重大突破。
讨论华人或华人“川粉”(Trump fans,特朗普的支持者)与美国中期选举的关系,重点不在于华人对选举结果有什么重大影响,而是这次选举本身对华人的身份认同、政治参与和未来地位有更重要的意义。如果我们分析东西两个海岸线的都会地带(波士顿-纽约-费城-巴尔的摩-华盛顿特区,西雅图-波特兰-旧金山湾区-洛杉矶-圣迭戈,加上夏威夷的檀香山), 这里已经囊括了250万还多的华人。而这些地区基本上是民主党蓝营的铁打营盘,华人基本被锁定。根据2016年的大选数据,79%的亚裔投票给希拉里·克林顿,18%支持特朗普。高收入想减税、高学历抱怨子女被常青藤名校族裔比例排斥、憎恨非法移民或裙带移民坐享美国福利、保守社会价值观反对认同政治(尤其是性别/同性恋/变性人等)、华人民主人权运动或台独期盼救星,所有这些催生了华人“川粉”。但他们被淹没在蓝营,无力翻盘,这激化了他们的受挫感和愤怒。“川粉”的政治特色也由此注定。
美国总统特朗普(又称川普)上任后在下列议题提出重大变革:移民限制,降低税收,削减福利(包括立志取消奥巴马医保),取消少数族裔促进政策,对华贸易和地缘政治大调整,性别认同等等,每一项议题都挑动了在美华人的神经。不难理解,在华人圈,甚至在跨国华人网络空间(微信,推特等社交媒体为平台),特立独行、满嘴跑火车的川普总统像一个巨大的磁铁,吸附了一批华人粉丝,同时也分化了部分华人。因为这些重大议题对华人造成的分歧模式不是“叠加强化型”(“白人、男性、无大学教育、南部居民、福音派信徒”模式使得特朗普倾向强化),而是“横向交叉型”(“亚裔女性、新移民、高收入、东北海岸居民、台湾认同”会使得选择复杂化),所以华人社区的政治争吵就似雾中看花,有时还因为与中国国内政治粘连,更像是一场泥淖中的烂仗。
美国政治现实是:人气和财力是政治较量的最关键资源。380万只占总人口1.5%的华人影响力必然微不足道。下列因素还在继续削弱华人影响:内部分裂(大陆/台湾/香港/东南亚背景,老华侨/新华人,第一代/本土出生,反共/拥共等等)、集中都会区而居住又郊区化(当然有中国城居民和郊区居民的差异)、文化障碍(语言、宗教和社区社团等因素)。而且,三分之一以上的亚裔女性与外族结婚(2013年的数字37%),比亚裔男性同类数字高出21个百分点。这一婚姻模式使得未来亚裔族群的政治人气不会有重大突破。
讨论华人或华人“川粉”(Trump fans,特朗普的支持者)与美国中期选举的关系,重点不在于华人对选举结果有什么重大影响,而是这次选举本身对华人的身份认同、政治参与和未来地位有更重要的意义。如果我们分析东西两个海岸线的都会地带(波士顿-纽约-费城-巴尔的摩-华盛顿特区,西雅图-波特兰-旧金山湾区-洛杉矶-圣迭戈,加上夏威夷的檀香山), 这里已经囊括了250万还多的华人。而这些地区基本上是民主党蓝营的铁打营盘,华人基本被锁定。根据2016年的大选数据,79%的亚裔投票给希拉里·克林顿,18%支持特朗普。高收入想减税、高学历抱怨子女被常青藤名校族裔比例排斥、憎恨非法移民或裙带移民坐享美国福利、保守社会价值观反对认同政治(尤其是性别/同性恋/变性人等)、华人民主人权运动或台独期盼救星,所有这些催生了华人“川粉”。但他们被淹没在蓝营,无力翻盘,这激化了他们的受挫感和愤怒。“川粉”的政治特色也由此注定。
Tuesday, October 30, 2018
बिहार में क्यों वायरल हो रहे हैं औरतों से अपराध के वीडियो?
"इन रेड लाइट एरिया वालों की रंगबाज़ी (दादागिरी) बहुत ज्यादा है. उनको सबक सिखाने के लिए ही उस औरत के साथ ऐसा किया गया."
बीते एक सितंबर को भुवनेश्वर से पटना लौट रही अंत्योदय एग्जाम स्पेशल ट्रेन में सवार राहुल ने मुझसे ये बात कही. रेलवे की परीक्षा देकर लौट रहे राहुल आरा के बिहारी मिल इलाके में रहते हैं.
राहुल जिस घटना की बात कर रहे हैं वो आरा के बिहिया ब्लॉक में बीते 20 अगस्त को घटी थी. यहां एक औरत को हत्या के शक में भीड़ ने सड़क पर नग्न करके घुमाया था.
आरा और वैशाली के रेलवे परीक्षार्थियों से खचाखच भरी इस ट्रेन में लगातार नौजवान लड़के शरारत कर रहे है. वे रुक-रुक कर नारे लगा रहे हैं- "आरा ज़िला घर बा, त कौन बात के डर बा."
उनके नारों के शोर के चलते कई लोकल यात्री जो परिवार के साथ ट्रेन पर सवार हुए, वो बीच स्टेशन पर ही उतर गए. इन नारे लगाने वालों में बिहिया का मंटू भी है.
मंटू कहता है," ये वीडियो वायरल ग़लत होता है. हम संस्कारी लोग है, हम लोगों को ख़ुद ये सब देखकर अच्छा नहीं लगता. "
अप्रैल 2018 में जहानाबाद में एक लड़की से छेड़खानी का वीडियो वायरल हुआ था जिसके बाद राज्य के अलग अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं सामने आईं. स्थानीय मीडिया की रिपोर्टिंग के मुताबिक कैमूर, नालंदा, सहरसा, मधुबनी, गया, सहरसा में ऐसे वीडियो वायरल हुए. इसके अलावा आरा के बिहिया की घटना भी है.
बिहार में साइबर सेल के एएसपी सुशील कुमार कहते हैं, "अपराध में उछाल से ज़्यादा ये मामला अपलोडिंग का है. वीडियो बनाकर उसे इंटरनेट पर अपलोड करना नया ट्रेंड है. सरकार इससे निपटने के लिए तत्पर है. थाना, अनुमंडल और जिला स्तर पर 'साइबर सेनानी' बनाए जा रहे हैं जो सोशल मीडिया सहित अन्य साइबर अपराध पर लगाम लगाएगें."
इसके अलावा गृह मंत्रालय ने नाम का वेब पोर्टल भी शुरू किया है. निर्भया फंड का इस्तेमाल करके शुरू किया गया यह वेब पोर्टल महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन शोषण पर काम करता है.
इस वेब पोर्टल पर आप अपनी पहचान छिपाकर भी वीडियो अपलोड करके उससे संबंधित जानकारी दे सकते हैं. दी गई जानकारी के आधार पर संबंधित राज्य को ये शिकायत भेजी जाती है जिसको 24 घंटे के अंदर ही शिकायत पर काम करना होता है.
सुशील कुमार बताते हैं, "जून 2018 से बिहार भी इस वेब पोर्टल से जुडा है और अब तक चार शिकायतें आ चुकी है. साइबर अपराध एक सामाजिक चुनौती भी है इसलिए लोग भी सहयोग करें."
लेकिन प्रशासनिक क़दम से इतर ये सवाल लाजिमी है कि इस नए ट्रेंड की वजह क्या है?
वरिष्ठ पत्रकार एस ए शाद कहते है, "दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त फासिस्ट ताक़तें अपराध करती थीं, उस अपराध का आनंद लेती थीं और प्रचारित भी करती थीं. ठीक यही बिहार में देखने को मिल रहा है. हालांकि ये अपराध संगठित न होकर स्पानटेनियटी में हो रहे है. बिहार में पहले ये यूपी की सीमा से लगे इलाकों में छिटपुट तौर पर देखने को मिला लेकिन अब ये फैल रहा है."
एक दूसरी वजह सहरसा के स्थानीय पत्रकार ब्रजेश कुमार बताते है. सहरसा में भी अभी हाल में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें साइकिल से जा रही एक छात्रा के साथ छेड़खानी करते कुछ लड़के और एक छात्रों को बचाता लड़का दिखाई दे रहा है.
ब्रजेश कहते है, "पहले 14 -15 साल के लड़के गांव कस्बे में खुली मोबाइल दुकान से 10 रुपए में अश्लील वीडियो अपलोड करवाते थे, अब तो डेटा वॉर से डेटा सस्ते होने के चलते अश्लील वीडियो उनके मोबाइल में उपलब्ध है. अब वो खुद वीडियो बना रहे है और उसके ज़रिए ब्लैकमेलिंग, किसी को बेइज्जत करते हैं."
हालांकि बिहार के सामंती समाज में इस वायरल वीडियो का जातीय ढांचा क्या है, इससे जुड़ी बातें निकलकर आना बाक़ी है.
बीते एक सितंबर को भुवनेश्वर से पटना लौट रही अंत्योदय एग्जाम स्पेशल ट्रेन में सवार राहुल ने मुझसे ये बात कही. रेलवे की परीक्षा देकर लौट रहे राहुल आरा के बिहारी मिल इलाके में रहते हैं.
राहुल जिस घटना की बात कर रहे हैं वो आरा के बिहिया ब्लॉक में बीते 20 अगस्त को घटी थी. यहां एक औरत को हत्या के शक में भीड़ ने सड़क पर नग्न करके घुमाया था.
आरा और वैशाली के रेलवे परीक्षार्थियों से खचाखच भरी इस ट्रेन में लगातार नौजवान लड़के शरारत कर रहे है. वे रुक-रुक कर नारे लगा रहे हैं- "आरा ज़िला घर बा, त कौन बात के डर बा."
उनके नारों के शोर के चलते कई लोकल यात्री जो परिवार के साथ ट्रेन पर सवार हुए, वो बीच स्टेशन पर ही उतर गए. इन नारे लगाने वालों में बिहिया का मंटू भी है.
मंटू कहता है," ये वीडियो वायरल ग़लत होता है. हम संस्कारी लोग है, हम लोगों को ख़ुद ये सब देखकर अच्छा नहीं लगता. "
अप्रैल 2018 में जहानाबाद में एक लड़की से छेड़खानी का वीडियो वायरल हुआ था जिसके बाद राज्य के अलग अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं सामने आईं. स्थानीय मीडिया की रिपोर्टिंग के मुताबिक कैमूर, नालंदा, सहरसा, मधुबनी, गया, सहरसा में ऐसे वीडियो वायरल हुए. इसके अलावा आरा के बिहिया की घटना भी है.
बिहार में साइबर सेल के एएसपी सुशील कुमार कहते हैं, "अपराध में उछाल से ज़्यादा ये मामला अपलोडिंग का है. वीडियो बनाकर उसे इंटरनेट पर अपलोड करना नया ट्रेंड है. सरकार इससे निपटने के लिए तत्पर है. थाना, अनुमंडल और जिला स्तर पर 'साइबर सेनानी' बनाए जा रहे हैं जो सोशल मीडिया सहित अन्य साइबर अपराध पर लगाम लगाएगें."
इसके अलावा गृह मंत्रालय ने नाम का वेब पोर्टल भी शुरू किया है. निर्भया फंड का इस्तेमाल करके शुरू किया गया यह वेब पोर्टल महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन शोषण पर काम करता है.
इस वेब पोर्टल पर आप अपनी पहचान छिपाकर भी वीडियो अपलोड करके उससे संबंधित जानकारी दे सकते हैं. दी गई जानकारी के आधार पर संबंधित राज्य को ये शिकायत भेजी जाती है जिसको 24 घंटे के अंदर ही शिकायत पर काम करना होता है.
सुशील कुमार बताते हैं, "जून 2018 से बिहार भी इस वेब पोर्टल से जुडा है और अब तक चार शिकायतें आ चुकी है. साइबर अपराध एक सामाजिक चुनौती भी है इसलिए लोग भी सहयोग करें."
लेकिन प्रशासनिक क़दम से इतर ये सवाल लाजिमी है कि इस नए ट्रेंड की वजह क्या है?
वरिष्ठ पत्रकार एस ए शाद कहते है, "दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त फासिस्ट ताक़तें अपराध करती थीं, उस अपराध का आनंद लेती थीं और प्रचारित भी करती थीं. ठीक यही बिहार में देखने को मिल रहा है. हालांकि ये अपराध संगठित न होकर स्पानटेनियटी में हो रहे है. बिहार में पहले ये यूपी की सीमा से लगे इलाकों में छिटपुट तौर पर देखने को मिला लेकिन अब ये फैल रहा है."
एक दूसरी वजह सहरसा के स्थानीय पत्रकार ब्रजेश कुमार बताते है. सहरसा में भी अभी हाल में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें साइकिल से जा रही एक छात्रा के साथ छेड़खानी करते कुछ लड़के और एक छात्रों को बचाता लड़का दिखाई दे रहा है.
ब्रजेश कहते है, "पहले 14 -15 साल के लड़के गांव कस्बे में खुली मोबाइल दुकान से 10 रुपए में अश्लील वीडियो अपलोड करवाते थे, अब तो डेटा वॉर से डेटा सस्ते होने के चलते अश्लील वीडियो उनके मोबाइल में उपलब्ध है. अब वो खुद वीडियो बना रहे है और उसके ज़रिए ब्लैकमेलिंग, किसी को बेइज्जत करते हैं."
हालांकि बिहार के सामंती समाज में इस वायरल वीडियो का जातीय ढांचा क्या है, इससे जुड़ी बातें निकलकर आना बाक़ी है.
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